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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परम ऐश्वर्य पाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे विद्वानो !] (सोमपाव्ने) ऐश्वर्य की रक्षा करनेवाले, (वज्रिणे) वज्रवाले (इन्द्राय) परमेश्वर के लिये (सोमम्) अमृत रस (सुनोत) निचोड़ो। (सः) वह (युवा) संयोग वियोग करनेवाला वा महाबली, (जेता) विजयी, (ईशानः) ईश्वर (पुरुष्टुतः) सबसे स्तुति किया गया है ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर के समस्त ऐश्वर्यों को विचारता हुआ अनेक ऐश्वर्य प्राप्त करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(सुनोत) अभिषुणुत (सोमपाव्ने) आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति सोम+पा रक्षणे−वनिप्। ऐश्वर्यरक्षकाय (सोमम्) अमृतरसम् (इन्द्राय) परमेश्वराय (वज्रिणे) वज्रोपेताय (युवा) सू० १।२। संयोजकवियोजकः। महाबली (जेता) विजयी (ईशानः) ईश ऐश्वर्ये−लटः शानच्। ईश्वरः (सः) इन्द्रः (पुरुष्टुतः) पुरुभिः सर्वैः स्तुतः प्रशंसितः ॥
