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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परम ऐश्वर्य पाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋत्विजः) हे ऋतु-ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले पुरुषो ! (इन्द्राय) परम ऐश्वर्यवाले परमात्मा के लिये (सोमम्) अमृत रस [तत्वज्ञान] (सुनोत) निचोड़ो (च) और (आ) अच्छे प्रकार (धावत) शोधो ! (वः) जो परमेश्वर (स्तोतुः) स्तुति करनेवाले (मे) मेरे (वचः) वचन (च) और (हवम्) पुकार को (शृणवत्) सुने ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा का तत्त्वज्ञान प्राप्त करके अपना सामर्थ्य बढ़ावें ॥१॥
टिप्पणी: १−(इन्द्राय) परमैश्वर्यवते जगदीश्वराय (सोमम्) अ० ३।१६।१। अमृतरसम्। तत्त्वबोधम् (ऋत्विजः) ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।२।५९। इति ऋतु+यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु−क्विन्। हे ऋतौ ऋतौ याजकाः। देवपूजकाः (सुनोत) अभिषुणुत (आ) समन्तात् (च) (धावत) धावु गतिशुद्ध्योः, णिजर्थः। शोधयत (स्तोतुः) स्तावकस्य (वचः) वाक्यम् (शृणवत्) श्रु श्रवणे, लेटि अडागमः। शृणुयात् (हवम्) आह्वानम् (च) (मे) मदीयम् ॥
