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देवता: सविता ऋषि: शन्ताति छन्द: गायत्री स्वर: पावमान सूक्त

उ॒भाभ्यां॑ देव सवितः प॒वित्रे॑ण स॒वेन॑ च। अ॒स्मान्पु॑नीहि॒ चक्ष॑से ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उभाभ्याम् । देव । सवित: । पवित्रेण । सवेन । च । अस्मान् । पुनीहि । चक्षसे ॥१९.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पवित्र आचरण के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे दानशील (सवितः) सत्य कर्मों में प्रेरक जगदीश्वर ! (उभाभ्याम्) दोनों अर्थात् (पवित्रेण) शुद्ध आचरण से (च) और (सवेन) ऐश्वर्य से (अस्मान्) हमें (चक्षसे) देखने के लिये (पुनीहि) पवित्र कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर का आश्रय लेकर शुद्ध आचरण से ऐश्वर्य बढ़ा कर संसार के पदार्थों को विज्ञानपूर्वक साक्षात् करे ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−९।६७।२५। और यजु० १९।४३ ॥
टिप्पणी: ३−(उभाभ्याम्) द्वाभ्याम् (देव) हे दातः (सवितः) सत्यकर्मसु प्रेरकेश्वर (पवित्रेण) शुद्धाचरणेन (सवनेन) ऐश्वर्येण (च) (अस्मान्) धार्मिकान् (पुनीहि) शोधय (चक्षसे) अ० १।५।१। दर्शनाय ॥