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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईर्ष्या के निवारण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (भूमिः) भूमि (मृतमनाः) मरे मनवाली [ऊसर] होकर (मृतात्) मरे से भी (मृतमनस्तरा) अधिक मरे मनवाली है। (उत) और (यथा) जैसे (मम्रुषः) मरे हुए मनुष्य का (मनः) मन है (एव) वैसे ही (ईर्ष्योः) डाह करनेवाले का (मनः) मन (मृतम्) मरा होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे भूमि ऊसर हो जाने से उपजाऊ नहीं रहती और जैसे मृतक प्राणी का मन कुछ नहीं कर सकता, वैसे ही डाह करनेवाला जल-भुन कर उद्योगहीन हो जाता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(यथा) येन प्रकारेण (भूमिः) सर्वप्राणिभिरधिष्ठिता पृथिवी (मृतमनाः) उत्पादनशक्तिहीना। ऊषरा (मृतात्) त्यक्तप्राणात्। मृतकात् (मृतमनस्तरा) अधिकमृतमना (उत) अपि च (मम्रुषः) मृङ् प्राणत्यागे−क्वसु। मृतवतः पुरुषस्य (मनः) मनोबलम् (एव) एवमेव (ईर्ष्योः) भृमृशीङ्०। उ० १।६। इति ईर्ष्य−उ। ईर्षायुक्तस्य पुरुषस्य (मृतम्) विनष्टं भवति (मनः) ॥
