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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईर्ष्या के निवारण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (ते) तेरी (ईर्ष्यायाः) डाह की (प्रथमाम्) पहिली (ध्राजिम्) गति को (उत) और (प्रथमस्याः) पहिली गति की (अपराम्) दूसरी गति को, (हृदय्यम्) हृदय में भरी (तम्) सतानेवाली (अग्निम्) अग्नि और (शोकम्) शोक को (निः) सर्वथा (वापयामसि) हम नष्ट करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दूसरों की वृद्धि देखकर कभी दाह न करें किन्तु दूसरे की उन्नति में अपनी उन्नति जानें ॥१॥
टिप्पणी: १−(ईर्ष्यायाः) ईर्ष्य ईर्ष्यायाम्−अ। परसम्पत्त्यसहनस्य मत्सरस्य (ध्राजिम्) वसिवपियजि०। उ० ४।१२५। इति ध्रज गतौ−इञ्। गतिम् (प्रथमाम्) आद्याम् (प्रथमस्याः) प्रथमभाविन्या गतेः (उत) अपि च (अपराम्) अनन्तरां गतिम् (अग्निम्) संतापम् (हृदय्यम्) शरीरावयवाद् यत्। पा० ४।३।५५। इति हृदय−यत्। हृदये भवम् (शोकम्) खेदम् (तम्) तर्द−ड। तर्दकं हिंसकम् (ते) तव (निः) नितराम् (वापयामसि) टुवप बीजसंताने छेदने च। वापयामः शमयामः ॥
