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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] तू (अलसाला) आलसियों को रोकनेवाली (पूर्वा) प्रधान शक्ति (असि) है, और तू (सिलाञ्जाला) कण-कण को प्रकट करनेवाली और (नीलागलसाला) सब लोकों के घर [ब्रह्माण्ड में] व्यापक (उत्तरा) अति उत्तम शक्ति (असि) है ॥४॥
भावार्थभाषाः - सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमेश्वर की महिमा को विचारते हुए मनुष्य सदा पुरुषार्थी होवें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अलसाला) अलस+अला। न लसतीति, लस दीप्तौ−अच्+अल वारणे−अच्, टाप्। अलसान् क्रियामन्दान् वारयति सा (असि) (पूर्वा) प्रधाना शक्तिः (सिलाञ्जाला) पिल कणश आदाने−क। पतिचण्डिभ्यामालञ्। उ० १।११७। इति सिल+अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु−आलञ्। सिलान् कणान् कणान् अनक्ति प्रकटयतीति सा (उत्तरा) उत्कृष्टतरा शक्ति (नीलागलसाला) नील+आगल+साला। नि+इल गतौ−क। डलयौरैक्यम्। ॠदोरप्। पा० ३।३।७७। इति आड्+गॄ निगरणे−अप्, रस्य लः। षल गतौ−घञ्, टाप्। नीलानां नीडानां निवासस्थानां लोकानाम् आगले आगरे आगारे गृहे ब्रह्माण्डे व्यापिका ॥
