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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर !] (ते) तेरा (पिता) पालन करनेवाला गुण (विहह्लः) विशेष कँपानेवाला [आश्चर्यजनक] (नाम) प्रसिद्ध है, और (ते) तेरी (माता) निर्माण शक्ति (मदवती) हर्षयुक्त (नाम) प्रसिद्ध है (सः) वह (हिन=हि) ही (त्वम्) तू (असि) है, (यः) जिस (त्वम्) तूने (आत्मानम्) हमारे आत्मा की (आवयः) रक्षा की है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा में वर्तमान रह कर सदा आत्मरक्षा करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(विहह्लः) वि+ह्वल चलने−अच्। छान्दसं रूपम्। विशेषकम्पकः (नाम) प्रसिद्धौ (ते) तव (पिता) पालको गुणः (मदावती) सांहितिको दीर्घः। हर्षवती (माता) अ० ५।५।१। निर्माणशक्तिः (सः) प्रसिद्धः (हिन) नकारश्छान्दसः। हि। खलु (त्वम्) (असि) (यः) (आत्मानम्) आत्मबलम् (आवयः) अव रक्षणे−लङ्, चुरादित्वं छान्दसम्। आवः। रक्षितवानसि ॥
