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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आबयो) हे चारों ओर गतिवाले ! (अनाबयो) हे विना गतिवाले ! (आबयो) हे चारों ओर कान्तिवाले ईश्वर ! (ते) तेरा (रसः) रस [आनन्द] (उग्रः) नित्य सम्बन्धवाला है। हम (ते) तेरे (करम्भम्) सत्तु [अन्न] (आ) भले प्रकार (अद्मसि) खाते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर में श्रद्धापूर्वक अन्न आदि पदार्थ प्राप्त करके भोगें ॥१॥
टिप्पणी: १−(आबयो) भृमृशीङ्०। उ० १।७। इति आङ्+वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु−उ। वस्य बः। हे समन्ताद् गतिशील (अनाबयो) वी−उ। हे गतिशून्य (रसः) आनन्दः (ते) तव (उग्रः) ऋज्रेन्द्राग्र०। उ० २।२८। इति उच समवाये−रन्। समवेतः। नित्यसम्बद्धः (आबयो) हे समन्तात् प्रकाशमान (आ) सम्यक् (ते) तव (करम्भम्) अ० ७।४।२। सक्तून्। अन्नम् (अद्मसि) अद्मः। खादामः ॥
