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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मृत्यु की प्रबलता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (यातुधानेभ्यः) पीड़ाप्रद रोगों को (नमः) नमस्कार और (ते) तेरे (भेषजेभ्यः) सुख देनेवाले वैद्यों को (नमः) नमस्कार है। (मृत्यो) हे मृत्यु ! (ते) तेरे (मूलेभ्यः) कारणों को (नमः) नमस्कार और (ब्राह्मणेभ्यः) वेदवेत्ता विद्वानों को (इदम्) यह (नमः) नमस्कार है ॥३॥
भावार्थभाषाः - रोगी और वैद्य मृत्यु के वश हैं, तो भी मनुष्य रोगों का निदान जानकर पुरुषार्थ करते रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(नमः) नमस्कारः (ते) तत्र (यातुधानेभ्यः) अ० १।७।१। पीडाप्रदेभ्यो रोगेभ्यः (भेषजेभ्यः) अ० १।४।४। भेषं भयं जयतीति। भेषजं सुखनाम−निघ० ३।६। सुखकरेभ्यो वैद्येभ्यः (मृत्यो) (मूलेभ्यः) मूल प्रतिष्ठायाम्−क। मूलं मोचनाद्वा मोषणाद्वा मोहनाद्वा−निरु० ६।३। कारणेभ्यः। निदानेभ्यः। (ब्राह्मणेभ्यः) वेदविद्भ्यः (इदम्) ॥
