0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मृत्यु की प्रबलता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (अधिवाकाय) अनुग्रह वचन को (नमः) नमस्कार और (ते) तेरे (परावाकाय) पराजय वचन को (नमः) नमस्कार है। (मृत्यो) हे मृत्यु ! (ते) तेरी (सुमत्यै) सुमति को (नमः) नमस्कार है और (ते) तेरी (दुर्मत्यै) दुर्मति को (इदम्) यह (नमः) नमस्कार है ॥२॥
भावार्थभाषाः - अनुग्रहकारी, पराजयकारी, सुमतिवाले और दुर्मतिवाले सब ही मृत्युवश हैं। मनुष्यों को सदा धर्मात्मा रहना चाहिये ॥२॥
टिप्पणी: २−(नमः) सत्कारः (ते) तव (अधिवाकाय) वच परिभाषणे−घञ्, कुत्वम्। अनुग्रहवचनाय (परावाकाय) पराभववचनाय (सुमत्यै) शोभनायै बुद्ध्यै (मृत्यो) हे मरण ! (दुर्मत्यै) कठोरायै बुद्ध्यै (इदम्) क्रियमाणम् ॥
