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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मृत्यु की प्रबलता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देववधेभ्यः) ब्राह्मणों के शस्त्रों को (नमः) नमस्कार और (राजवधेभ्यः) क्षत्रियों के शस्त्रों को (नमः) नमस्कार है। (अथो) और भी (ये) जो (विश्यानाम्) वैश्यों के (वधाः) शस्त्र हैं (तेभ्यः) उनको, और (मृत्यो) हे मृत्यु ! (ते) तुझ को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्याबली, पराक्रमबली और धनबली भी मृत्यु के वश हैं। इस से सब धर्माचरण करते रहें ॥१॥
टिप्पणी: १−(नमः) नमस्कारः। सत्कारः (देववधेभ्यः) ब्राह्मणानां विद्यारूपशस्त्रेभ्यः (राजवधेभ्यः) क्षत्रियाणां हननसाधनेभ्यः शस्त्रेभ्यः (अथो) अपि च (ये) (विश्यानाम्) विश प्रवेशने−क्यप्। वैश्यानाम् (वधाः) धनरूपायुधानि (तेभ्यः) वधेभ्यः (मृत्यो) अ० १।३०।३। हे मरण (अस्तु) (ते) तुभ्यम् ॥
