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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पाप नाश करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मध्वा) अमृत से [तुझ को] (पृञ्चे) मैं संयुक्त करता हूँ। (नद्यः) नदियाँ, (पर्वताः) पर्वत और (गिरयः) छोटे पहाड़ (मधु) अमृत [होवें]। (परुष्णी) पालन सामर्थ्यवाली, (शीपाला) निद्रा लानेवाली ओषधि (मधु) अमृत [आस्ने] तेरे मुख के लिये (शम्) शान्ति और (हृदे) हृदय के लिये (शम्) शान्ति (अस्तु) होवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सब पदार्थों से विवेकपूर्वक उपकार लेकर आनन्द भोगें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(मध्वा) अमृतेन (पृञ्चे) पृची सम्पर्के। संयोजयामि त्वाम् (नद्यः) (पर्वताः) (गिरयः) क्षुद्रशैलाः (मधु) अमृतम् (परुष्णी) अर्तिपॄवपि०। उ० २।११७। इति पॄ पालनपूरणयोः−उसि। लोमादिपामादि०। पा० ५।२।१००। इति परुष्−न मत्वर्थे। गौरादित्वाद् ङीष्। परुष्णी पर्ववती भास्वती कुटिलगामिनी−निरु० ९।२६। परुष्णीम् पालिकां नीतिम्−दयानन्दभाष्ये ऋ० ७।१८।९। पालनवती (शीपाला) शीङो धुक्लक्०। उ० ४।३८। इति शीङ् शयने−वालन्, स च कित् वस्य पः, टाप्। शेते अनया। सुखदायिका यवाद्योषधिः (शम्) शान्तिः (आस्ने) पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति आस्यस्य आसन्। आस्याय मुखाय (अस्तु) (हृदे) हृदयाय ॥
