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प्रा॒णाया॒न्तरि॑क्षाय॒ वयो॑भ्यो वा॒यवेऽधि॑पतये॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्राणाय । अन्तरिक्षाय । वय:ऽभ्य: । वायवे । अधिऽपतये । स्वाहा ॥१०.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

स्वास्थ्य की रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणाय) प्राण के लिये (अन्तरिक्षाय) अन्तरिक्ष लोक को, और (वयोभ्यः) अन्न आदि पदार्थों के लिये (अधिपतये) [अन्तरिक्ष के] बड़े रक्षक (वायवे) वायु को (स्वाहा) सुन्दर स्तुति है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अन्तरिक्ष और वायु से उपकार लेकर प्राण और अन्न आदि पदार्थों को पुष्ट करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(प्राणाय) प्राणहिताय (अन्तरिक्षाय) मध्यलोकाय (वयोभ्यः) अ० २।१०।३। अन्नादिपदार्थेभ्यः (वायवे) गमनशीलाय पवनाय (अधिपतये) अन्तरिक्षस्य पालकाय (स्वाहा) सुन्दरस्तुतिः ॥