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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (सत्यस्य) सत्य का (सूनुः) प्रेरक परमात्मा (सिन्धौ अन्तः) समुद्र [हृदय आदि गहरे स्थान] के भीतर है, (तम् उ) उस ही (युवानम्) संयोग वियोग करनेवाले, अथवा महाबली, (अद्रोघवाचम्) द्रोहरहित वाणीवाले, (सुशेवम्) अत्यन्त सुख देनेवाले परमेश्वर की (स्तुहि) स्तुति कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो सर्वव्यापक परमात्मा कल्याण वाणी वेदविद्या द्वारा दुःखों को हटा कर मोक्ष पद देता है, उसकी महिमा जान कर मनुष्य सदा पुरुषार्थ करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(तम्) प्रसिद्धम् (उ) एव (स्तुहि) प्रशंस (यः) परमात्मा (अन्तः) मध्ये (सिन्धौ) स्यन्दनशीले समुद्रे, हृदयादिगम्भीरदेशे (सूनुः) सुवः कित्। उ० ३।३५। इति षू प्रेरणे−नु। प्रेरकः (सत्यस्य) यथार्थस्य वेदज्ञानस्य (युवानम्) कनिन् युवृषितक्षि०। उ० १।१५६। इति यु मिश्रणामिश्रणयोः−कनिन्। संयोजकवियोजकम्। बलवन्तम् (अद्रोघवाचम्) द्रुह जिघांसायाम्−घञ्, हस्य घः। द्रोहरहितवाग्युक्तम्। कल्याणवाणिं परमेश्वरम् (सुशेवम्) अ० ४।२५।५। अतिशयेन सुखकरम् ॥
