पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अमी) इन [शत्रुओं] ने (यम्) जिस (ब्रह्माणम्) वृद्धिशील पुरुष को (अपभूतये) हमारी हार के लिये (पुरोदधिरे) उच्च पद पर रक्खा है। (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (सः) वह मैं (ते) तेरे (अधस्पदम्) पाँव के नीचे (तम्) उसको (मृत्यवे) मृत्यु के लिये (प्रति) प्रतिकूलता से (अस्यामि) फेंकता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - शत्रु लोग जिस विद्वान् पुरुष को बहकाकर बड़ा पद देकर हमारी हानि करावें, हमारे राजपुरुष उसको पकड़कर प्राणान्त तक दण्ड देवे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(यम्) (अमी) शत्रवः (पुरोदधिरे) अग्रे धृतवन्तः। प्रधानपदे स्थापितवन्तः (ब्रह्माणम्) ब्रह्मा परिवृढः श्रुततो ब्रह्म परिवृढं सर्वतः−निरु० १।८। वृद्धिशीलं विद्वांसम् (अपभूतये) अस्माकं पराजयाय (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (सः) सोऽहम् (ते) तव (अधस्पदम्) अ० २।७।२। अधोभागे पादतले (तम्) शत्रुम् (प्रति) प्रतिकूलतया (अस्यामि) प्रक्षिपामि (मृत्यवे) मरणाय ॥
