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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (या) जो (महती) बलवती, (महोन्माना) बड़े डीलवाली [निर्धनता] (विश्वाः) सब (आशाः) दिशाओं में (व्यानशे) व्याप्त हुई है। (तस्यै) उस (हिरण्यकेश्यै) सुवर्ण का प्रकाश करानेवाली (निर्ऋत्यै) क्रूर विपत्ति को (नमः अकरम्) मैंने नमस्कार किया है ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वव्यापिनी निर्धनता में फँसकर और अन्त में उस का नाश करके सुवर्ण आदि धन प्राप्त करते हैं ॥९॥
टिप्पणी: ९−(या) अरातिः (महती) बलवती (महोन्माना) विशालपरिमाणा (विश्वाः) सर्वाः (आशाः) दिशाः (व्यानशे) अशू−लिट्। व्याप (तस्यै) (हिरण्यकेश्यै) हिरण्य+केश−ङीप्। केशा रश्मयः काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा−निरु० १२।२५। सुवर्णस्य प्रकाशिकायै (निर्ऋत्यै) अ० ३।११।२। कृच्छ्रापत्तये−निरु० २।७। (अकरम्) अहं कृतवानस्मि (नमः) सत्कारम् ॥
