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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उत) और (अराते) हे अदान शक्ति [निर्धनता] (पुरुषस्य) मनुष्य के (चितम्) चित्त (च) और (आकूतिम्) संकल्प (वीर्त्सन्ती) असिद्ध करती हुई (नग्ना) लज्जित (बोभुवती) बार-बार होती हुई तू (स्वप्नया) नींद [आलस्य] के साथ (जनम्) जनसमूह को (सचसे) प्राप्त होती है ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य निर्धनता के कारण अपने चित्त और संकल्प को नष्ट करते, लज्जित और आलसी होते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(उत) अपि च (नग्ना) ओनज व्रीडायाम्−क्त ओदितश्च। पा० ८।२।४५। इति तस्य न। लज्जिता (बोभुवती) भू सत्तायां यङ्लुगन्तात्−शतृ। पुनः पुनर्भवन्ती (स्वप्नया) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्याच्। स्वप्नेन। आलस्येन (सचसे) समवैषि (जनम्) मनुष्यसमूहम् (अराते) हे अदानशक्ते (चित्तम्) अन्तःकरणम् (वीर्त्सन्ती) म० १। वि+ऋधु−सन्, शतृ, ङीप्। असाधयन्ती नाशयन्ती (आकूतिम्) संकल्पम् (पुरुषस्य) मनुष्यस्य (च) ॥
