पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (असमृद्धे) हे असमृद्धि ! (परः) परे (अप इहि) चली जा, (ते) तेरी (हेतिम्) बरछी को (वि नयामसि) हम अलग हटाते हैं। (अराते) हे अदान शक्ति ! [निर्धनता !] (अहम्) मैं (त्वा) तुझको (निमीवन्तीम्) निर्बल करनेवाली और (नितुदन्तीम्) भीतर चुभनेवाली (वेद) जानता हूँ ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य महादुःखदायिनी निर्धनता को प्रयत्नपूर्वक हटावें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(परः) परस्तात् दूरदेशे (अप इहि) अपगच्छ (असमृद्धे) हे असम्पत्ते (वि) पृथक् (ते) तव (हेतिम्) हननशक्तिम् (नयामसि) नयामः प्रापयामः (वेद) जानामि (त्वा) त्वाम् (अहम्) (नि मीवन्तीम्) नि निषेधे+मीव स्थौल्ये−शतृ, ङीप्। क्षीणस्थौल्यं निर्बलं कुर्वतीम् (नि तुदन्तीम्) तुद व्यथने−शतृ। नितरां व्यथयन्तीम् (अराते) अदानशक्ते ॥
