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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवकृता) महात्माओं की उत्पन्न की हुई (नः) हमारी (वनिः) भक्ति (दिवा) दिन (च) और (नक्तम्) रात (प्र) अच्छे प्रकार (कल्पताम्) समर्थ होवे। (वयम्) हम लोग (अरातिम्) अदान शक्ति [निर्धनता] को (अनुप्रेमः) ढूँढ कर पावें, (अरातये) अदान शक्ति को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विद्वानों से शिक्षा पाकर सदा परस्पर भक्ति बढ़ावें और धैर्य से विपत्तियों को सहकर उत्तम पुरुषार्थ करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(प्र) प्रकर्षेण (नः) अस्माकम् (वनिः) भक्तिः (देवकृता) देवैर्विद्वद्भिः सृष्टा प्रेरिता (दिवा) दिने (नक्तम्) नज व्रीडायाम्−क्त। रात्रौ (च) (कल्पताम्) समर्था भवतु (अरातिम्) अदानशक्तिम् (अनुप्रेमः) इण् गतौ−लट्। अनुसृत्य प्रगच्छामः (वयम्) उत्साहितः (नमः) (अस्तु) (अरातये) अदानशक्तये निर्धनतायै ॥३॥
