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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [जो] (सुभगा) बड़े ऐश्वर्यवाली (हिरण्यवर्णा) सुवर्ण का रूप रखनेवाली (हिरण्यकशिपुः) सुवर्ण के वस्त्रवाली (मही) बलवती है। (तस्यै) उस (हिरण्यद्रापये) सुवर्ण द्वारा निन्दित गति से बचानेवाली (अरात्यै) अदान शक्ति [निर्धनता] को (नमः अकरम्) मैंने नमस्कार किया है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विपत्तियों का सहन करके अन्त में धनी, बली और सुखी होते हैं ॥१०॥ इति दशमः प्रपाठकः ॥
टिप्पणी: १०−(हिरण्यवर्णा) सुवर्णरूपा (सुभगा) बह्वैश्वर्ययुक्ता (हिरण्यकशिपुः) कश शब्दे हिंसायां च−कु। निपातनात् साधुः। कशिपुर्वस्त्रम्। सुवर्णवस्त्रा (मही) बलवती (तस्यै) (हिरण्यद्रापये) द्रा कुत्सायां गतौ−क्विप्। भुजेः किच्च। उ० ४।१४२। इति द्रा+पा रक्षणे−इ, स च कित्। हिरण्येन सुवर्णेन कुत्साया गतेः रक्षिकायै (अरात्यै) अदानशक्तये निर्धनतायै (अकरम्) अहं कृतवानस्मि (नमः) नमस्कारम् ॥
