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अवै॑तेनारात्सीरसौ॒ स्वाहा॑। ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒षेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव । एतेन । अरात्सी: । असौ । स्वाहा । तिग्मऽआयुधौ । तिग्महेती इति तिग्मऽहेती । सुऽशेवौ । सोमारुद्रौ । इह । सु । मृडतम् । न: ॥६.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:6


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब सुख प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमेश्वर] (एतेन) अपनी व्याप्ति से (असौ) उस तूने अधर्मी को (अव अरात्सीः) निर्धन बनाया है, (स्वाहा) यह सुन्दर वाणी वा स्तुति है। (तिग्मायुधौ) हे तेज शस्त्रोंवाले..... म० ५ ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अधर्मियों को निर्धनी रखता है, सो राजा और वैद्य धार्मिक होकर प्रजा में सुख बढ़ाते रहें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(अव अरात्सीः) नीचै राद्धवान् निर्धनं कृतवानसि दुरात्मानम्। अन्यद् गतम्। म० ५ ॥