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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वृक्षंवृक्षम्) प्रत्येक स्वीकारयोग्य पदार्थ में (आ) सब प्रकार (रोहसि) तू प्रकट है, (वृषण्यन्ती इव) जैसे ऐश्वर्यवान् सूर्य को चाहनेवाली (कन्यला) प्रकाश पानेहारी उषा [सूर्य में] है। (जयन्ती) जप करनेहारी (प्रत्यातिष्ठन्ती) प्रत्यक्ष स्थिर रहनेहारी और (स्परणी) प्रीति करनेवाली शक्ति (नाम) नाम (वै) अवश्य (असि) तू है ॥३॥
भावार्थभाषाः - वह सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी प्रत्येक वस्तु में ऐसा प्रीति से रम रहा है, जैसे उषा सूर्य्य में ॥३॥
टिप्पणी: ३−(वृक्षंवृक्षम्) वृक्ष स्वीकारे−पचाद्यच्। प्रत्येकं वरणीयं पदार्थम् (आ)। समन्तात् (रोहसि) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च। प्रकटोऽसि (वृषण्यन्ती) वृषन्−अ० १।१२।१। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इति क्यच्−शतृ। वृषाणं सूर्यमिच्छन्ती (इव) यथा (कन्यला) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति कनी दीप्तिकान्तिगतिषु−यक्, ला आदाने−क टाप्। प्रकाशाग्निहोत्री। उषाः (जयन्ती) तॄभूवहिवसि०। उ०। ३।१२८। इति जि जये−झच्, ङीष्। विजया (प्रत्यातिष्ठन्ती) ष्ठा−शतृ। प्रत्यक्षेण स्थात्री (स्परणी) स्पृ प्रीतिपालनयोः−ल्युट्, ङीप्। प्रीणयित्री (नाम) (वै) (असि) ॥
