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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कुष्ठ) हे गुणपरीक्षक राजन् ! तू (नाम) अवश्य (उत्तमः) अतिश्रेष्ठ (असि) है, (ते) तेरा (पिता) पिता (नाम) प्रसिद्ध (उत्तमः) अति उत्तम है। (सर्वम्) सब (यक्ष्मम्) राजरोग को (च) अवश्य (नाशय) नाश कर (च) और (तक्मानम्) दुःखित जीवन करनेवाले ज्वर को (अरसम्) असमर्थ (कृधि) बना ॥९॥
भावार्थभाषाः - उत्तम गुणी राजा अपने उत्तम कुलका स्मरण करके प्रजा की दुःखों से सदा रक्षा करे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(उत्तमः) श्रेष्ठः (नाम) स्वीकारे। अवश्यम् (कुष्ठ) म० १ हे गुणपरीक्षक राजन् (असि) (उत्तमः) श्रेष्ठः (नाम) प्रसिद्धौ (ते) तव (पिता) पालकः। जनकः (यक्ष्मम्) अ० २।१०।५। राजरोगं क्षयम् (च) (सर्वम्) (नाशय) निवारय (तक्मानम्) म० १ कृच्छ्रजीवनकरं ज्वरम् (च) (अरसम्) असमर्थम् (कृधि) कुरु ॥९॥
