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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) सो तू (हिमवतः) उद्योगी पुरुष से (जातः) उत्पन्न होकर और (उदङ्) ऊँचा पद पाकर (प्राच्याम्) प्रकृष्ट गति के बीच (जनम्) मनुष्यों में (नीयसे) लाया जाता है। (तत्र) वहाँ पर (कुष्ठस्य) गुणपरीक्षक राजा के (उत्तमानि) उत्तम-उत्तम (नामानि) यशों का (वि) विविध प्रकार से (भेजिरे) उन्होंने सेवन किया है ॥८॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण उत्तम राजा को पाकर सदा उसका नाम गाते रहते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(उदङ्) ऊर्ध्वं पदं गतः (जातः) प्रादुर्भूतः (हिमवतः) म० २ उद्योगिनः पुरुषात् (सः) स त्वम् (प्राच्याम्) प्रकृष्टायां गत्याम् (नीयसे) प्राप्यसे (जनम्) लोकं प्रति (तत्र) जनसमूहे (कुष्ठस्य) म० १। गुणपरीक्षकस्य पुरुषस्य (नामानि) यशांसि (उत्तमानि) श्रेष्ठानि (वि) विविधम् (भेजिरे) भज सेवायाम्−लिट्। सेवितवन्तः ॥
