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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवेभ्यः) विद्वान् पुरुषों से (अधि) ऐश्वर्य के साथ (जातः असि) तू उत्पन्न है, और (सोमस्य) ऐश्वर्यवान् पुरुष का (हितः) हितकारी (सखा) (असि) तू है। (सः) सो तू (मे) मेरे (प्राणाय) प्राण के लिये, (व्यानाय) व्यान के लिये और (चक्षुषे) नेत्र के लिये (अस्मै) इस पुरुष पर (मृड) सुखी हो ॥७॥
भावार्थभाषाः - कुलीन ऐश्वर्यवान् राजा कुलीन ऐश्वर्यवान् पुरुषों का सत्कार करता हुआ उनकी सर्वथा रक्षा करता रहे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः सकाशात्। (अधि) ऐश्वर्येण (जातः) उत्पन्नः (असि) (सोमस्य) ऐश्वर्ययुक्तस्य (सखा) सृहृद् (हितः) शुभकारकः (सः) स त्वम् (प्राणाय) प्राणहिताय (व्यानाय) व्यानहिताय (चक्षुषे) चक्षुर्हिताय (मे) मम (अस्मै) उपस्थिताय पुरुषाय (मृड) सुखी भव ॥
