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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कुष्ठ) हे गुणपरीक्षक पुरुष ! (मे) मेरे (इमम्) इस (तम्) पीड़ित (पुरुषम्) पुरुष को (आ वह) ले, और (तम्) उसको [दुःख से] (निष्कुरु) बाहिर कर। (तम् उ) उसको ही (मे) मेरे लिये (अगदम्) नीरोग (कृधि) कर ॥६॥
भावार्थभाषाः - राजा प्रयत्नपूर्वक प्रजा के मानसिक और शारीरिक रोगों को हटावे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इमम्) दृश्यमानम् (मे) मम (कुष्ठ) म० १। हे गुणपरीक्षक पुरुष (पुरुषम्) अ० १।१६।४। पुरुषम्। जनम् (तम्) तर्द। हिंसायाम्−ड हिंसितम् (आ वह) आनय (तम्) पूर्वोक्तम् (निष्कुरु) बहिष्कुरु। उद्धर (तम्) (उ) एव (अगदम्) गद कथने रोगे च−अच्। अरोगम् (कृधि) कुरु ॥
