वांछित मन्त्र चुनें
168 बार पढ़ा गया

हि॑र॒ण्ययी॒ नौर॑चर॒द्धिर॑ण्यबन्धना दि॒वि। तत्रा॒मृत॑स्य॒ पुष्पं॑ दे॒वाः कुष्ठ॑मवन्वत ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हिरण्ययी । नौ: । अचरत् । हिरण्यऽबन्धना । दिवि । तत्र । अमृतस्य । पुष्पम् । देवा: । कुष्ठम् । अवन्वत ॥४.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:4


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हिरण्ययी) तेजोमयी, (हिरण्यबन्धना) तेजोमय बन्धनवाली (नौः) नाव (दिवि) प्रकाशलोक में (अचरत्) चलती थी। (तत्र) वहाँ पर (अमृतस्य) अमृत के (पुष्पम्) विकाश, (कुष्ठम्) गुणपरीक्षक पुरुष को (देवाः) विद्वान् लोगों ने (अवन्वत) माँगा है ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग तीक्ष्णबुद्धि मनुष्य द्वारा उत्तम विद्या का प्रकाश करके आनन्द पाते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४−(हिरण्ययी) हिरण्ययी तेजोमयी (नौः) अ० ३।६।७। तरणिः (अचरत्) अगमत् (हिरण्यबन्धना) तेजोमयबन्धनयुक्ता (दिवि) प्रकाशलोके (पुष्पम्) पुष्प विकसने−पचाद्यच्। विकाशम्। अन्यद् गतम्। म० ३ ॥