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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवसदनः) विद्वानों के बैठने योग्य (अश्वत्थः) वीरों के ठहरने का देश (तृतीयस्याम्) तीसरी [निकृष्ट और मध्यम अवस्था से परे, श्रेष्ठ] (दिवि) गति में (इतः) प्राप्त होता है, (तत्र) उसमें (अमृतस्य) अमृत के (चक्षणम्) दर्शन, (कुष्ठम्) गुणपरीक्षक पुरुष को (देवाः) महात्माओं ने (अवन्वत) माँगा है ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों ने निश्चय किया है कि मनुष्य सर्वोत्तम पुरुषार्थ से सर्वजन हितैषी होता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(अश्वत्थः) अ० ३।६।१। अश्वानां कर्मसु व्यापनशीलानां वीराणां स्थितिदेशः (देवसदनः) महात्मनां स्थितियोग्यः (तृतीयस्याम्) निकृष्टमध्यमाभ्यां तृतीयस्यां श्रेष्ठायाम् (इतः) इण्−क्त। प्राप्तः (दिवि) गतौ। अवस्थायाम् (तत्र) तस्मिन् स्थाने (अमृतस्य) अमरणस्य। चिरजीवनस्य (चक्षणम्) दर्शनम्। रूपम् (देवाः) विद्वांसः (कुष्ठम्) म० १। निष्कर्षकं गुणपरीक्षकम् (अवन्वत) वनु याचने। याचितवन्तः ॥
