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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुपर्णसुवने) उत्तम पालन सामर्थ्य उत्पन्न करने हारे (गिरौ) स्तुति योग्य कुल में (हिमवतः) उद्योगी पुरुष से (परि) अच्छे प्रकार (जातम्) उत्पन्न पुरुष को (धनैः) धनों के साथ वर्तमान (श्रुत्वा) सुनकर [विद्वान् लोग] (अभि यन्ति) सन्मुख पहुँचते हैं, [और उस को] (तक्मनाशनम्) दुःखित जीवन नाश करने हारा (हि) निश्चय करके (विदुः) जानते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग उत्तम कुल में उत्पन्न प्रतापी, धनी पुरुष को अपना राजा बनाते और उस पर प्रजा की रक्षा का भार रखते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(सुपर्णसुवने) धापॄवस्य०। उ० ३।६। इति पॄ पालनपूरणयोः−न। भूसूधू०। उ० २।८०। इति पू प्रेरणे, यद्वा षूङ् प्राणिप्रसवे−क्युन्। उत्तमपालनस्योत्पादके (गिरौ) म० १। पूज्ये कुले (जातम्) उत्पन्नम् (हिमवतः) हन्तेर्हि च। उ० १।१४७। इति हन हिंसागत्योः−मक्। गतिमतः। उद्योगिनः पुरुषात् (परि) पूजायाम्। सुष्ठु (धनैः) धनैः सह वर्त्तमानम् (अभि) आभिमुख्येन (श्रुत्वा) आकर्ण्य (यन्ति) गच्छन्ति विद्वांसः (विदुः) जानन्ति (हि) निश्चयेन (तक्मनाशनम्) कृच्छ्रजीवननाशकम् ॥
