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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस [दुष्ट] ने (कर्तुम्) हिंसा को (चकार) किया था, वह (न शशाक) समर्थ न था, उसने (पादम्) अपना पैर और (अङ्गुरिम्) अंगुरी (शश्रे) तोड़ डाली। उस (अभगः) अभागे पुरुष ने (अस्मभ्यम्) हम (भगवद्भ्यः) ऐश्वर्यवालों को (भद्रम्) आनन्द (चकार) किया ॥११॥
भावार्थभाषाः - दुर्बलात्मा पापी दण्ड पाकर अपने हाथ पैर में कष्ट पाकर धर्मात्माओं को नहीं सता सकता ॥११॥ यह मन्त्र कुछ भेद से अ० ४।१८।६। में आया है ॥
टिप्पणी: ११−(यः) दुष्टः (चकार) कृतवान् (न) निषेधे (शशाक) शक्त आसीत् (कर्तुम्) अ० ४।१८।६। कृञ् हिंसायाम्−तुन्। हिंसाम् (शश्रे) शीर्णवान् (पादम्) चरणम् (अङ्गुरिम्) अङ्गुलिम् (चकार) (भद्रम्) कल्याणम् (अस्मभ्यम्) धर्मात्मभ्यः (अभगः) अनैश्वर्यः (भगवद्भ्यः) ऐश्वर्यवद्भ्यः ॥
