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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अपथेन) कुमार्ग से (एनाम्) इस (हिंसा) को (आ जभार) वह लाया था, (ताम्) उसको (पथा) सुमार्ग से (इतः) इस स्थान से (प्र हिण्मसि) हम निकालते हैं। (अधीरः) वह अधीर [शत्रु] (मर्याधीरेभ्यः) मर्यादा धारण करनेवाले पुरुषों के लिये (अचित्त्या) अपने अज्ञान से [उस] हिंसा को (सम् जभार) लाया था ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो कुमार्गी पुरुष सत्पुरुषों के साथ दोष करते हैं, सत्पुरुष उनको कुमार्ग से छुड़ा कर सुमार्ग में ले आते हैं ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(अपथेन) ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। पा० ५।४।७४। इति अ+पथिन्−अप्रत्ययः। कुमार्गेण (आ) (जभार) जहार। आनिनाय (एनाम्) कृत्याम् (ताम्) (पथा) सुमार्गेण (इतः) अस्मात् स्थानात् (प्र हिण्मसि) हि गतिवृद्धयोः। हिनुमीना। पा० ८।४।१५। इति णत्वम्। प्रेषयामः। अपसारयामः (अधीरः) सुसूधाञ्गृधिभ्यः क्रन्। उ० २।२४। इति डुधाञ् धारणपोषणयोः−क्रन्। अधारकः। अपण्डितः (मर्याधीरेभ्यः) मर्यादाधारकेभ्यः (सम्) सम्यक् (जभार) निनाय (अचित्त्या) अज्ञानेन ॥
