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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा के उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरी (अङ्गभेदः) हड़फूटन, (अङ्गज्वरः) शरीर का ज्वर, (च) और (यः) जो (हृदयामयः) हृदय का रोग है वह और (यक्ष्मः) राजरोग, (वाचा) वेदवाणी से (साढः) हारा हुआ [वह सब रोग] (श्येनः इव) श्येन पक्षी के समान (परस्तराम्) बहुत दूर (प्र अपप्तत्) भाग गया है ॥९॥
भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य महाकठिन रोगों को अच्छा करता है, वैसे ही मनुष्य वेद द्वारा आत्मदोष त्यागकर सुखी होवे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(अङ्गभेदः) शरीरावयवविकारः (अङ्गज्वरः) सर्वाङ्गतापः (यः) (च) (ते) तव (हृदयामयः) वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१००। इति हृञ् हरणे−कयन्, दुगागमः। इति हृदयम्। वलिमलितनिभ्यः कयन्। उ० ४।९९। इति अम पीडने चुरा०−कयन्। इति आमयो रोगः। मनोरोगः (यक्ष्मः) राजरोगः (श्येनः) शीघ्रगामी पक्षिविशेषः (इव) यथा) (प्र) (अपप्तत्) पत्लृ गतौ लुङि लृदित्वात् च्लेरङादेशः। पतः पुम्। पा० ७।१।१९। इति पुमागमः। प्रागमत् (वाचा) वेदवाण्या (साढः) षह−क्त। अभिभूतः (परस्तराम्) दूरतराम् ॥
