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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा के उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मा बिभेः) तू मत डरे, (न मरिष्यसि) तू नहीं मरेगा। (त्वा) तुझे (जरदष्टिम्) स्तुति के साथ व्याप्ति का भोजनवाला (कृणोमि) मैं करता हूँ। (तव) तेरे (अङ्गेभ्यः) अङ्गों से (अङ्गज्वरम्) अङ्ग-अङ्ग में ज्वर करनेवाले (यक्ष्मम्) राजरोग वा क्षयरोग को (निः=निःसार्य) निकाल कर (अहम्) मैंने (अवोचम्) वचन कहा है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य निर्भय होकर धर्म करता है, वह मृत्यु अर्थात् अपकीर्ति से बचकर नाम करता है, जैसे सद्वैद्य महारोग को निकाल कर यश पाता है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(मा बिभेः) अ० २।१५।१। शङ्कां मा कुरु (न) निषेधे (मरिष्यसि) प्राणान् मोक्ष्यसि (जरदष्टिम्) म० ५। जरता स्तुत्या सह व्याप्तिमन्तं भोजनवन्तं वा (कृणोमि) करोमि (त्वा) पुरुषार्थिनम् (निः) निःसार्य (अवोचम्) उक्तवानस्मि (अहम्) (यक्ष्मम्) अ० २।१०।५। राजरोगम् क्षयम् (अङ्गेभ्यः) अवयवेभ्यः (अङ्गज्वरम्) अङ्गेषु तापकरम् (तव) ॥
