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यद्दु॒द्रोहि॑थ शेपि॒षे स्त्रि॒यै पुं॒से अचि॑त्त्या। उ॑न्मोचनप्रमोच॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । दुद्रोहिथ । शेपिषे । स्त्रियै । पुसे । अचित्त्या । उन्मोचनप्रमोचने इत्युन्मोचनऽप्रमोचने । उभे इति । वाचा । वदामि । ते ॥३०.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:30» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आत्मा के उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो (स्त्रियै) स्त्री के लिये वा (पुंसे) पुरुष के लिये (अचित्त्या) अचेतना से (दुद्रोहिथ) तूने अनिष्ट चीता है वा (शेपिषे) शाप दिया है। (उभे) दोनों.... म० २ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परद्रोह और पर निन्दा से पृथक् रहे और किसी प्रकार से होजाने पर प्रायश्चित्त करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यत्) यदि (दुद्रोहिथ) द्रुह−लिट्। अनिष्टं चिन्तितवानसि (शेपिषे) शपितवानसि (स्त्रियै) (पुंसे) पुरुषाय (अचित्त्या) अचेतनया। अन्यद् गतम् ॥