0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा के उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) चाहे (स्वः) अपनी ज्ञातिवाले (पुरुषः) पुरुष ने और (यत्) चाहे (अरणः) न बात करने योग्य, अबोध (जनः) जन ने (त्वा) तुझसे (अभिचेरुः) दुष्कर्म किया है। (उभे) दोनों (उन्मोचनप्रमोचने) अलग रहना और छुटकारा (ते) तुझको (वाचा) वेदवाणी से (वदामि) मैं बतलाता हूँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दुष्टों के फंदों से अलग रहे, और फँस जाने पर उपाय करके निकल आवे ॥२॥
टिप्पणी: २−(यत्) यदा (त्वा) त्वाम् (अभिचेरुः) अभि+चर गतौ भक्षणे च−लिट्। अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि। पा० ६।४।१२०। इति एकारः। अभिचरितवन्तः। दुष्कृतवन्तः (पुरुषः) (स्वः) स्वकीयः (यत्) यदि वा (अरणः) अ० १।१९।३। अ+रण शब्दे−अप्। अरणीयः। असंभाष्यः। अबोधः (जनः) (उन्मोचनप्रमोचने) उन्मोचनं पृथक्त्वं प्रमोचनं विमोक्षं च (उभे) द्वे (वाचा) वेदवाण्या (वदामि) कथयामि (ते) तुभ्यम् ॥
