वांछित मन्त्र चुनें

इ॒यम॒न्तर्व॑दति जि॒ह्वा ब॒द्धा प॑निष्प॒दा। त्वया॒ यक्ष्मं निर॑वोचं श॒तं रोपी॑श्च त॒क्मनः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इयम् । अन्त: । वदति । जिह्वा । बध्दा । पनिष्पदा ।त्वया । यक्ष्मम् । नि: । अवोचम् । शतम् । रोपी: । च । तक्मन: ॥३०.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:30» पर्यायः:0» मन्त्र:16


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आत्मा के उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्तः) [मुख के] भीतर (बद्धा) बँधी हुई, (पनिष्पदा) थरथराकर चलती हुई (इयम्) यह (जिह्वा) जीभ (वदति) बोलती रहती है। (त्वया) तेरे साथ वर्त्तमान (यक्ष्मम्) राजरोग (च) और (तक्मनः) ज्वर की (शतम्) सौ (रोपीः) पीड़ाओं को (निः=निःसार्य) निकाल कर (अवोचम्) मैंने वचन कहा है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार जीभ को मुख में दबाकर वेदमन्त्र आदि पवित्र वचन बोलते हैं, उसी प्रकार मनुष्य इन्द्रियों को वश में करके अपने सब मलों को धोकर स्वस्थचित्त होवे ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(इयम्) प्रसिद्धा (अन्तः) मुखमध्ये (वदति) उच्चारयति (जिह्वा) रसना (बद्धा) संयता (पनिष्पदा) अप+निः+पदा। अलोपः। अपगत्य विकृत्य नितरां गतिमती (त्वया) त्वया सह वर्तमानम् (यक्ष्मम्) राजरोगम् (निः) निःसार्य (अवोचम्) उक्तवानस्मि (शतम्) बह्वीः (रोपीः) रुप विमोहने−इन्, ङीप्। विमोहनानि। यातनाः (च) (तक्मनः) ज्वरस्य ॥