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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा के उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषी) दो देखनेवाले (बोधप्रतीबोधौ) बोध और प्रतिबोध [अर्थात् विवेक और चेतनता] हैं, (यः) जो एक-एक (अस्वप्नः) न सोनेवाला (च) और (जागृविः) जागनेवाला है। (ते) तेरे (प्राणस्य) प्राण के (गोप्तारौ) रखवाले (तौ) वह दोनों (दिवा) दिन (च) और (नक्तम्) रात (जागृताम्) जागते रहें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विवेक और चेतनापूर्वक नित्य सावधान रहकर रक्षा करे ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(ऋषी) अ० २।६।१। ऋषिर्दर्शनात्−निरु० २।१। दर्शकौ (बोधप्रतीबोधौ) विवेकचेतने (अस्वप्नः) निद्राहीनः (यः) यः प्रत्येकः (च) (जागृविः) जॄशॄजागृभ्यः क्विन्। उ० ४।५४। इति जागृ निद्राक्षये−क्विन्। जागरूकः। नृपतिः (तौ) (ते) तव (प्राणस्य) जीवस्य (गोप्तारौ) रक्षकौ (दिवा) दिने (नक्तम्) रात्रौ (च) (जागृताम्) जागृतौ भवताम् ॥
