पदार्थान्वयभाषाः - (तिस्रः देवीः) हे तीनों कमनीय गुणवाली शक्तियो ! (नः) हमें (महि) बड़ी (शर्म) शरण वा सुख, (च) और (नः) हमारी (प्रजायै) प्रजा के लिये और (तन्वे) शरीर के लिये (यत्) जो कुछ (पुष्टम्) पोषण है [वह भी] (यच्छत) दान करो। (प्रजया) प्रजा से (मा हास्महि) हम न छूटें और (मा) न (तनूभिः) अपने शरीरों से, (सोम) हे ऐश्वर्यवाले (राजन्) राजन् परमेश्वर ! (द्विषते) वैरी के लिये (मा रधाम) हम न दुःखी होवें ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य तीन उत्तम शक्तियों अर्थात् उत्तम विद्या, संग्रह शक्ति और पृथिवी पालन से अपनी और प्रजा की उन्नति करें ॥७॥ तीनों उत्तम शक्तियों का वर्णन य० २७।१९। में इस प्रकार है। ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑द॒न्त्विडा॒ सर॑स्वती॒ भारती। म॒ही गृणा॒ना ॥ (तिस्रः देवीः) तीन उत्तम शक्तियाँ, अर्थात् (मही) बड़ी पूजनीय और (गृणाना) उपदेश करनेवाली (इडा) स्तुति योग्य भूमि, (सरस्वती) प्रशस्त विज्ञानवाली विद्या और (भारती) धारण पोषण शक्ति (इदम् बर्हिः) इस वृद्धि कर्म में (आ सदन्तु) आवें ॥