वांछित मन्त्र चुनें

यथा॒ सो अ॒स्य प॑रि॒धिष्पता॑ति॒ तथा॒ तद॑ग्ने कृणु जातवेदः। विश्वे॑भिर्दे॒वैः स॒ह सं॑विदा॒नः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा । स: । अस्य । परिऽधि: । पताति । तथा । तत् । अग्ने । कृणु । जातऽवेद: । विश्वेभि: । देवै: । सह । सम्ऽविदान: ॥२९.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:29» पर्यायः:0» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जिस प्रकार से (अस्य) उस [शत्रु] का (सः परिधिः) वह परकोटा (पताति) गिर पड़े, (तत्) सो (जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (विश्वेभिः) सब (देवैः सह) उत्तम गुणों के साथ (संविदानः) मिलता हुआ तू (तथा) वैसा (कृणु) कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजा शत्रु से प्रजा की रक्षा करने का उपाय सदा करता रहे ॥३॥
टिप्पणी: ३−गतम्। म० २ ॥