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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जिस प्रकार से (अस्य) उस [शत्रु] का (सः परिधिः) वह परकोटा (पताति) गिर पड़े, (तत्) सो (जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (विश्वेभिः) सब (देवैः सह) उत्तम गुणों के साथ (संविदानः) मिलता हुआ तू (तथा) वैसा (कृणु) कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजा शत्रु से प्रजा की रक्षा करने का उपाय सदा करता रहे ॥३॥
टिप्पणी: ३−गतम्। म० २ ॥
