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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (ते) तेरे (एताः) यह (समिधः) विद्यादि की प्रकाशक्रियायें (पिशाचजम्भनीः) मांसभक्षक [प्राणियों वा रोगों] की नाश करनेवाली हैं। (जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध ! (त्वम्) तू (ताः) उन से (जुषस्व) प्रसन्न हो, (च) और (एनाः) इनको (प्रति गृहाण) प्रतीति से अङ्गीकार कर ॥१४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष विद्या द्वारा दुःखदायी प्राणी और रोगों का नाश करे और धर्मकार्य में सदा प्रवृत्त रहे ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(एताः) प्रत्यक्षाः (ते) तव (अग्ने) विद्वन् (समिधः) विद्यादिप्रकाशक्रियाः (पिशाचजम्भनीः) मांसभक्षकानां प्राणिनां रोगाणां वा नाशयित्र्यः (ताः) समिधः (त्वम्) (जुषस्व) प्रीणीहि (प्रति) प्रतीत्य (च) (एनाः) समिधः (गृहाण) स्वीकुरु (जातवेदः) हे प्रसिद्धविद्य ॥
