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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रक्षा और ऐश्वर्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतुभिः) ऋतुओं से (त्वा) तुझ परमेश्वर को, (आर्तवैः) ऋतुओं के विभागों से (त्वा) तुझ को और (संवत्सरस्य) सब के निवास देनेवाले सूर्य के (तेन) उस (तेजसा) तेज से (आयुषे) अपने जीवन के लिये और (वर्चसे) तेज के लिये (संहनु) संयुक्त (कृण्मसि) हम करते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग ऋतु, मास आदि काल और सूर्य आदि रचनाओं के विचार से परमेश्वर की महिमा साक्षात् करते हैं ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(ऋतुभिः) वसन्तादिकालविशेषैः (त्वा) ब्रह्म। परमेश्वरम् (आर्तवैः) ऋतुविभागैः (आयुषे) जीवनवर्धनाय (वर्चसे) तेजःप्राप्तये (त्वा) (संवत्सरस्य) अ० १।३५।४। सम्यग्निवासकस्य सूर्यस्य (तेजसा) प्रकाशेन (तेन) प्रसिद्धेन (संहनु) शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति हन हिंसागत्योः−उ। संगतम्। संयुक्तम् (कृण्मसि) कुर्मः ॥
