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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वे) सब [उत्तम गुण] (अस्य) इसके (व्रतम्) व्रत की और (देवीः) प्रकाशवाले (द्वारः) घरके द्वारों की (विश्वहा=विश्वधा) अनेक प्रकार (अनु) अनुकूल रीति से (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् के उत्तम गुण ही उनके नियमों और घर आदि की रक्षा करते हैं ॥७॥
टिप्पणी: ७−(द्वारः) द्वृ संवरणे णिच्−विच्। द्वारः पदनाम−निघ० ५।२। द्वारो जवतेर्वा द्रवतेर्वा−निरु० ८।९। यज्ञे गृहद्वार इति कात्थक्योऽग्निरिति शाकपूणिः−निरु० ८।१०। द्वाराणि (देवीः) देदीप्यमानाः (अनु) आनुकूल्येन। (अस्य) विदुषः (विश्वे) विश्वेदेवाः सर्वे दिव्यगुणाः (व्रतम्) सत्यभाषणादिकर्म (रक्षन्ति) पान्ति (विश्वहा) धस्य हः। विश्वधा। अनेकधा ॥
