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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मन्द्रासु) आनन्दक्रियाओं में और (प्रयक्ष) बड़े समाजों में (तरी) तारनेवाला विद्वान् (च) और (वसुधातरः) अधिक धनों का धारण करनेवाला पुरुष (च) और (वसवः) उत्तम-उत्तम गुणी लोग (अतिष्ठन्) स्थित हुए हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - उद्योगी प्रधान होने से समाज के सब सभ्य गुणी और धनी होते हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(तरी) तरस्तरणमस्यास्तीति। तर−इनि। संतारको विद्वान् (मन्द्रासु) स्फायितञ्चिवञ्चि०। उ० २।१३। इति मदि मोदे−रक्, टाप्। हर्षक्रियासु (प्रयक्षु) म० ५। प्रकृष्टसमाजेषु (वसवः) उत्तमगुणाः पुरुषाः (च) (अतिष्ठन्) स्थिता अभवन् (वसुधातरः) वसुधा−तरप्। अधिकधनानां धारकः (च) ॥
