वांछित मन्त्र चुनें

अच्छा॒यमे॑ति॒ शव॑सा घृ॒ता चि॒दीडा॑नो॒ वह्नि॒र्नम॑सा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अच्छ । अयम् । एति। शवसा । घृता । चित् । ईडान: । वह्नि । नमसा ॥२७.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:27» पर्यायः:0» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पुरुषार्थ का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह [शुभ गुणों की] (ईडानः) स्तुति करता हुआ (वह्निः) निर्वाह करनेवाला पुरुष (चित्) ही (शवसा) बल, (घृता) जल और (नमसा) अन्न के साथ (अच्छ) अच्छे प्रकार (एति) चलता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष सब का बल और धन बढ़ाता हुआ कीर्ति पाता है ॥४॥ (घृता) के स्थान पर यजुर्वेद, २७।१४ में [घृतेन] है ॥
टिप्पणी: ४−(अच्छ) सम्यक्। अभिमुखम्। अच्छाभेराप्तुमिति शाकपूणिः−निरु० ५।२८। (अयम्) प्रसिद्धः (एति) गच्छति (शवसा) बलेन (घृता) घृतेन, उदकेन−निघ० १।१२। (चित्) निश्चयेन (ईडानः) शुभगुणान् स्तुवन् (वह्निः) वहिश्रिश्रुयु०। उ० ४।५१। इति वह प्रापणे−नि। कार्यनिर्वाहकः। वह्नयो वोढारः−निरु० ८।३। (नमसा) अन्नेन−निघ० २।७ ॥