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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह [शुभ गुणों की] (ईडानः) स्तुति करता हुआ (वह्निः) निर्वाह करनेवाला पुरुष (चित्) ही (शवसा) बल, (घृता) जल और (नमसा) अन्न के साथ (अच्छ) अच्छे प्रकार (एति) चलता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष सब का बल और धन बढ़ाता हुआ कीर्ति पाता है ॥४॥ (घृता) के स्थान पर यजुर्वेद, २७।१४ में [घृतेन] है ॥
टिप्पणी: ४−(अच्छ) सम्यक्। अभिमुखम्। अच्छाभेराप्तुमिति शाकपूणिः−निरु० ५।२८। (अयम्) प्रसिद्धः (एति) गच्छति (शवसा) बलेन (घृता) घृतेन, उदकेन−निघ० १।१२। (चित्) निश्चयेन (ईडानः) शुभगुणान् स्तुवन् (वह्निः) वहिश्रिश्रुयु०। उ० ४।५१। इति वह प्रापणे−नि। कार्यनिर्वाहकः। वह्नयो वोढारः−निरु० ८।३। (नमसा) अन्नेन−निघ० २।७ ॥
