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दे॒वो दे॒वेषु॑ दे॒वः प॒थो अ॑नक्ति॒ मध्वा॑ घृ॒तेन॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

देव: । देवेषु । देव: । पथ: । अनक्ति । मध्वा । घृतेन ॥२७.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:27» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पुरुषार्थ का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवेषु) व्यवहारकुशल लोगों के बीच (देवः) व्यवहारकुशल और (देवः) विजय चाहनेवाला पुरुष (मध्वा) ज्ञान से और (घृतेन) प्रकाश से (पथः) मार्गों को (अनक्ति) खोलता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों में महाविद्वान् सत्यप्रतिज्ञावाला पुरुष संसार में सन्मार्ग का प्रचार करता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(देवः) व्यवहारकुशलः (देवेषु) व्यवहारिषु विद्वत्सु (देवः) विजिगीषुः (पथः) मार्गान् (अनक्ति) व्यनक्ति व्यक्तीकरोति (मध्वा) अ० १।४।१। मन ज्ञाने−उ, नस्य धः। मधुना। ज्ञानेन (घृतेन) प्रकाशेन ॥