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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समाज की वृद्धि करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रविद्वान्) बड़ा विद्वान्, (सुयुजः) सुयोग्य, (भगः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (आशिषः) अपनी इष्ट प्रार्थनाओं को (नु) शीघ्र (अस्मै) इस [संसार के हित] के लिये (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (युनक्तु) लगावे, (युनक्तु) लगावे ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य निरन्तर प्रयत्न करके संसार की भलाई में सदा लगा रहे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(भगः) भगवान्। ऐश्वर्यवान् (युनक्तु युनक्तु) नित्यवीप्सयोः। पा० ८।१।४। इति नित्ये द्विर्वचम्। नित्यं योजयतु (आशिषः) आङः शासु इच्छायाम्−क्विप्। इष्टप्रार्थनाः (अस्मै) दृश्यमानाय संसाराय। अन्यद् गतम् ॥
