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त्वष्टा॑ युनक्तु बहु॒धा नु रू॒पा अ॒स्मिन्य॒ज्ञे यु॑नक्तु सु॒युजः॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वष्टा । युनक्तु । बहुऽधा । नु । रूपा: । अस्मिन् । यज्ञे । सुऽयुज: । स्वाहा॥२६.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुयुजः) सुयोग्य (त्वष्टा) सूक्ष्मदर्शी पुरुष (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (बहुधा) अनेक प्रकार (नु) शीघ्र (रूपाः) अनेक रूपवाली क्रियाओं को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (युनक्तु) प्रयुक्त करे ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अनेक प्रकार से क्रियाकुशल होकर परस्पर उन्नति करें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(त्वष्टा) अ० २।५।६। सूक्ष्मदर्शी पुरुषः (नु) क्षिप्रम् (रूपाः) अर्शआदिभ्योऽच्। पा० ५।२।१२७। इति रूप−अच् भूम्नि। अनेकरूपवतीः क्रियाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥