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विष्णु॑र्युनक्तु बहु॒धा तपां॑स्य॒स्मिन्य॒ज्ञे सु॒युजः॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विष्णु: । युनक्तु । बहुऽधा । तपासि । अस्मिन् । यज्ञे । सुऽयुज: । स्वाहा ॥२६.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुयुजः) सुयोग्य (विष्णुः) कामों में व्यापक पुरुष (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (बहुधा) अनेक प्रकार (तपांसि) अपनी विभूतियों को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (युनक्तु) लगावे ॥७॥
भावार्थभाषाः - चतुर पुरुषार्थी पुरुष दुसरों की उन्नति करने में अपनी उन्नति करे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(विष्णुः) कर्मसु व्यापकः पुरुषः (युनक्तु) योजयतु (बहुधा) अनेकप्रकारेण (तपांसि) तप संतापे ऐश्वर्ये च−असुन्। ऐश्वर्याणि। विभूतयः। अन्यद् गतम् ॥