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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समाज की वृद्धि करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह (अदितिः) अखण्ड नीति (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ (बर्हिषा) उद्यम से और (प्रोक्षणीभिः) अच्छी-अच्छी वृद्धियों से (यज्ञम्) आपस में मिलाप (तन्वाना) फैलाती हुई (आ अगन्) आई है ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वरदत्त वेदविद्या को पुरुषार्थपूर्वक विचार कर परस्पर उन्नति करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इयम्) प्रसिद्धा वैदिकी (आ अगन्) आगमत् (बर्हिषा) बर्ह उद्यमने−इसि। उद्यमेन (प्रोक्षणीभिः) प्र+उक्ष सेचने वृद्धौ च−ल्युट्, ङीप्। प्रकृष्टवृद्धिभिः। उक्षण उक्षतेर्वृद्धिकर्मण उक्षन्त्युदकेनेति वा−निरु० १२।९। (यज्ञम्) संगमम् (तन्वाना) तनु विस्तारे−शानच्। विस्तारयन्ती सती (अदितिः) अ० २।२८।४। वाङ्नाम−निघ० १।११। अखण्डनीतिः (स्वाहा) सुवाण्या ॥
