पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समाज की वृद्धि करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (युक्ताः) हे योग्य (मरुतः) शूर पुरुषो ! (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (इह) यहाँ (यज्ञे) परस्पर मिलाप में (छन्दांसि) आनन्द बढ़ानेवाले कर्मों को [इस प्रकार] (पिपृत) पालो, (माता इव) जैसे माता (पुत्रम्) कुलशोधक सन्तान को ॥५॥
भावार्थभाषाः - पराक्रमी विजयी महात्मा परोपकार करने में अपने सामर्थ्य भर प्रयत्न करें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(छन्दांसि) अ० ४।३४।१। आह्लादकानि कर्माणि (यज्ञे) संगमे (मरुतः) अ० १।२०।१। हे विजयिनो देवाः (स्वाहा) (माता) अ० १।२।१। माननीया जननी (इव) यथा (पुत्रम्) कुलशोधकं सन्तानम् (पिपृत) पॄ पालनपूरणयोः। पालयत (इह) अस्मिन् संसारे (युक्ताः) योग्याः। मिलिताः ॥
